1.
मेरा नसीब हर बार मुझे रुलाता क्यों है,
मेरा नसीब हर बार मुझे रुलाता क्यों है,
वो ख्वाब है अगर तो याद आता क्यों है।
कैसा आफताब है दिन में जो नहीं दिखता,
वो चांद हैं गर तो अंधेरों में छुप जाता क्यों है।।
तू फूल हैं गर तो गुलिसतां को कर रौशन,
तू गर पत्थर हैं तो आईनों से घबराता कयों हैं। ।
हजार दाग थे दामन में फिर भी अपना लगे,
वो गैर भी हो तो मेरे सामने मुस्कराता कयों हैं।।
हाल देखकर मेरा मेरे तबीब ने ये कहां मुझसे,
हौसला तूफानो का हैं लहरों से घबराता कयों हैं।।
2.
जिस जख्म को सहलाऊ उस जख्म पे जां निकले,
बहूत परेशां हो के आंसू अब खां-म-खां निकले।।
बहुत उम्मीद थी जिससे कभी साथ ना छोडेंगे,
मुकद्दर समझा जिसको वहीं दुशमनें - जां निकले।।
खूशबू मुहब्बत की जिसकी हर दीवार से आती थी,
झूठी निकली वो बस्ती भी झूठे सब गरां निकले।।
महज़ इत्तेफाक लगता था मंजिलों को भी सर करना,
अब जिस राह से गुजरू तो पग-पग पे जां निकले।।
उसके होठों के तबस्सुम को जिंदगी मान बैठें थे,
उसके होठों के तबस्सुम को जिंदगी मान बैठें थे,
मगर अफैसोस वो ही मेरी तबाही के निशां निकले।।
अवतार आरजू
